Monday, May 25, 2020

A poem by Sadhna Bahuguna

समन्दर के किनारे हो 
खड़े उसकी थाह नापने 
 की कोशिश न कर । 
उठती हुई तरंगों को कभी 
गिनने की कोशिश न कर ।
अनगिनत नदियों से ,
मिलने पर भी वो अपनी ,
तासीर नहीं भूला।
समा लेता है सब कुछ ,
अपने भीतर ही ,
बदद् गुमानी से कभी ,
सर चढ़ कर नहीं बोला ।
ख़ासियत उसकी क़ाबिले ,
तारीफ़ है वो कभी अपनी ,
सीमा लांघ कर नहीं खेला ।
साधना

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